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ek din Mazooda baba ji taran taran ke satsang ghar pe gaye

मौजूदा सरकार तरनतारन के सरप्राइज विजिट पर थे । दर्शन के बाद बहुत सारे लोगों ने अपनी-अपनी बात कही । अंत में एक बुजुर्ग जो पीछे बैठे थे , कुछ कहने की इच्छा जाहिर की । सतगुरु ने इशारा किया तो बीच से रास्ता साफ हो गया । बुजुर्ग आगे आए । उनके कपड़ों पर जगह-जगह पैबन्द लगे हुए थे । चश्में के नाम पर दो लेंस थे जो बीच में भी बंधे हुए थे और कान के साथ धागे द्वारा बंधे हुए थे । चप्पल क्या दो अलग-अलग तल्ले थे जो रस्सी द्वारा अंगूठे और पीछे एड़ियों से बंधे थे । सर पर बालों में शायद पांच-सात महीने से न पानी गया था न तेल । सामने पड़ी कुर्सी की तरफ सतगुरु ने इशारा किया । बुजुर्ग बिना किसी औपचारिकता या नानुकुर के कुर्सी खींचकर बैठ गए । सतगुरु ने इशारा किया , ‘ कुछ आदेश ….।’
बुजुर्ग ने कहना शुरू किया , ” पूरे जीवन बड़ी रहमत रही है , जिंदगी बड़े शुकून से कटी । अब जीवन के आखरी पड़ाव में बस भूल न जाना , ऐसी ही दया-महर रहे तो ये जीवन सार्थक हो जाए ।”

सतगुरु ने अपनी ही भाषा में चेहरे की कुछ खास-भाव-भंगमाओं से जो कहना था कह दिया ।
वहाँ मौजूद लगभग सभी की आंखों से आंसू बह निकले ।
आज हमारे पास घर है गाड़ियां हैं , फेक्ट्री है , दुकान है , बच्चे लगभग सैटल हैं ; लेकिन शुकराना शायद ही कभी जुवान पर आता हो । क्योकि कि हमें लगता है , पैसा हमने कमाया है । जिस दिन पैसा और सुख , दात लगने लगेगा उसदिन शुकराना भी आ जाएगा । दूसरे , कोई कहे कि पैसा सुख दे सकता है तो ये सरासर गलत है । पैसा जीने के संसाधन खरीद सकता है , सुख तो कतई नहीं दे सकता । बिना संतोष के सुख मिल ही नहीं सकता और संतोष में न पैसे का ‘ प ‘आता है , न रुपये का ‘ र ‘ और न दौलत का ‘ द ‘ ।
राधा स्वामी जी

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