Home / Sakhi / Baba ji ek baar Raja aur vajirr ki Sakhi sunai

Baba ji ek baar Raja aur vajirr ki Sakhi sunai

एक समय की बात है राजा का एक वजीर अपने महल के बागीचे में टहल रहा था और उसी समय वजीर के सामने एक बहुत ही भयानक शक्ल का दैत्य या पिशाच उसके सामने आकर खड़ा हो गया उसकी शक्ल ईतनी भयानक थी कि पत्थर भी देख कर पानी हो जाए वजीर ने जब पिशाच को देखा , उसकी आँखें फटी की फटी रह गइ! बाल खड़े हो गये ! और उस पिशाच ने कहां तुम यहां ईस बाग मे घूम रहे हो ! आज तो मै तुमको अपने साथ लेने आया हूँ ! ईतनी बात बोल कर पिशाच गायब हो गया ! और वजीर का सर से लेकर पैरों तक पसीना छूट गया वजीर को समझ नही आया के वो पिशाच याँ दानव कौन था ! वजीर बाग कर महल के अन्दर गया और बादशाह से घबराई हुई जुबान मे कहां महाराज महाराज, ,, उधर बाग में एक दैत्य है ! बादशाह ने कहां क्या हुआ वजीर, , क्या बोल रहे हो !! होश मे तो हो ! वजीर ने बादशाह को सारी बात बताई! बादशाह ने कहां हमारी रियासत मे ईतना भयानक कोई भी नही है ! यह तुम्हारे मन् का व्हम है ! वजीर ने कहा महाराज मै पुरे होशो हवास मे हूँ ! आप मेरी बात का यकीन करें ! बादशाह ने कहां ठीक है वजीर तुम घबराओ मत! वो पिशाच तुमको बाग मे पकड़ेगा ! हम तुमको एक तूर्की घोड़ा देते है ! और साथ मे 20,,, 25 सैनिक देते है ! तुम शाम होने से पहले इस सूबे की हद से बाहर निकल जाना !!! वजीर के अन्दर उस पिशाच का एसा डर बैठ गया था ! कि बिना समय गवाँयें ! घोड़ा लेकर शहर से निकल गया ! वजीर बिना खाऐ पिये घोड़े के ऊपर शाम तक चलता रहा ! और शाम को बगदाद के एक किले के अन्दर पहुँच गया ! वहां वजीर का कोई जानने वाला था ! उसने वजीर से आने का कारण पूछा ! वजीर ने कहा मित्र मै सफर मे थक गया हूँ !

थोड़ा आराम करना चाहता हूँ ! वजीर के मित्र ने एक कमरे मे वजीर के रहने का इन्तजाम कर दिया ! वजीर ने कमरे के अन्दर जा कर दरवाजे को मजबूत कड़ियां लगा ली ! और कमरे के अन्दर दुबक कर बैठ गया ! उसी क्षण वो पिशाच वहां आ गया ! और हँसने लगा और वजीर से कहां के तुमको सुबह बाग मे देख कर मै हैरान हो गया था।मैंने तुमको बगदाद में इस जगह पर इस वक़्त पकड़ना था।
इतना कहते ही उस पिशाच या दैत्य ने उसके प्राण निकाल लिए ऐ जीव काल बहुत बड़ा शिकारी है। वह हमारे एक एक श्वास को जाते हुए देख रहा है।जैसे ही हमारी श्वासों की पूंजी समाप्त हो जायेगी ।वोह हमको घसीट कर ले जायेगा वह इतना क्रूर और निर्दयी है।वोह यह नहीं देखता के घर में एक ही कमाने वाला है।वोह यह भी नहीं देखता के कोई सोया पड़ा है ।घर से बाहर है।परदेस में है।कोई अगर मगर नहीं वोह ले ही जाता है।और ले ही जायेगा चलो चले उस दयाल के पास जो गुरु प्रसाद (नामदान)देकर हमारी जिम्मेदारी लेता है। के वह हमको काल से भी बचाएगा।और सच्चखंड भी ले जाएगा तारीख बदल रही है।दिन बदल रहे है बचपन से जवानी फिर जवानी से बुढ़ापा एक दिन की पूंजी 24000श्वास व्यर्थ के धंधो में बच्चो में पैसो में जा रहे है।जबकि एक श्वास की कीमत त्रिलोकी से भी ऊपर है कबीर साहब कहते है।
“कहत हूँ कहे जात् हूँ कहूँ बजाये ढोल
श्वासा खाली जात् है तीन लोक का मोल”

error: Content is protected !!